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INTERNATIONAL JOURNAL OF EDUCATION, MODERN MANAGEMENT, APPLIED SCIENCE & SOCIAL SCIENCE (IJEMMASSS) [ Vol. 6 | No. 3 (I) | July - September, 2024 ]

भारत में लोक उपक्रमों की स्वायत्तता

डॉ. जगदीष प्रसाद मीना (Dr. Jagdish Prasad Meena)

प्रायः सार्वजनिक उपक्रमों की स्वायतता से तात्पर्य इनकी कार्य की स्वायतता से माना जाता है। आज यह भावना प्रबल होती जा रही है कि लोक क्षेत्र में होने वाले उद्योगों को स्वायत्तता प्रदान की जाये। लोक उद्योगों के सम्बन्ध में स्वायत्तता के नाम पर विवादास्पद स्थिति रही है। सामान्यतता स्वयत्तता से तात्पर्य लोक उपक्रमों की स्वतन्त्रता एक बहुत ही विस्तृत क्षेत्र है, जिसमें स्वयं स्वायत्तता भी समा जाती है। स्वायत्तेता का अर्थ है कि उसे किसी की कार्य में खुली छूट दी जाए, किन्तु स्वायत्तता में वित्तीय एवं परिचालन स्वायत्तता आती है। स्वायत्तता के सम्बन्ध में यह विचार-विमर्ष निस्तर गतिषील रहा है कि सार्वजनिक उपक्रमों को कितनी मात्रा में स्वायत्तता दी जाए। विभिन्न समितियों के प्रतिवेदन आदि के बारे में निष्कर्ष रूप में यह कहा गया कि लोक उपक्रमों के दैनिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं किया जाएं एवं केवल उपक्रम से सम्बन्धित महत्वपूर्ण मामलों तक ही सीमित रखा जाय। स्वायत्तता से संकीर्ण अर्थ सें आशय किसी उपक्रम को परिचालन स्वायत्तता एवं वित्तीय स्वायत्तता प्रदान करने से है एवं विस्तृत दृष्टिकोण में स्वायत्तता से तात्पर्य उपक्रम द्वारा निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए तथा व्यवसाय का निर्बाध गति में कुशल संचालन हेतु सम्बन्धित अधिनियम एवं सम्बन्धित मन्त्रालय के नियन्त्रण में दिन प्रतिदिन के कार्यों में संसदीय हस्तक्षेप से स्वतन्त्र रहकर उपक्रम का प्रबन्ध एवं संचालन कार्य करने से है। लोक उपक्रमों की स्वायतता के सम्बन्ध में 1959 में इकाफे में कहा गया था कि स्वायत्तता का समर्थन करने का आशय सरकार के उत्तरदायी उच्च अंगों में इस बात के लिए शिक्षित करने की आवश्यकता पर बल देना है कि संयम से काम लें एवं वास्तविक महत्वपूर्ण बातों में हस्तक्षेप करने तक ही अपने को सीमित रखें। स्वायत्तता के लिए यह जरूरी होगा के क्रम में उसे सही लक्ष्य तक कि उसे उसी मात्रा में अनुपात में अधिकार एवं उत्तरदायित्व भी सुपुर्द किये जाय। प्रत्येक उपक्रम को कार्य प्रारम्भ करने के साथ ही उसकी क्रियाओं के सम्बन्ध में कोई स्पष्ट विवरण प्रस्तुत करना आवश्यक है। सरकार केवल मात्र सामयिक प्रतिवेदनों के माध्यमों से निर्धारित उद्देश्यों को ध्यान में रखती हुई सम्बन्धित उपक्रमों के क्रिया-कलापों का मूल्यांकन करेगी जो अपना एक अलग ही मत्वपूर्ण दृष्टिकोण रखते है।

शब्दकोशः लोक उपक्रम, स्वायत्तता, प्राक्कलन समिति, विनियोग, लालफीताशाही, केन्द्रीयकरण, कल्याणकारी राज्य।


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