ISO 9001:2015

अपोह की धारणा, स्वरूप तथा सैद्धांतिक विकास: एक पुनर्विलोकन

भीम शंकर मीना (Bheem Shankar Meena)

बौद्ध न्याय परंपरा में अपोहवाद शब्दार्थ एवं संकल्पना-निर्माण की समस्या के समाधान हेतु विकसित एक केन्द्रीय दार्शनिक सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार शब्द किसी स्वतंत्र सार्वभौमिक सत्ता का बोध न कराते हुए ‘अन्य’ के निषेध (अपोह) के मा/यम से अपना अर्थ ग्रहण करते हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र में बौद्ध न्याय परंपरा के अंतर्गत अपोहवाद के स्वरूप तथा उसके ऐतिहासिक विकास का दार्शनिक मूल्यांकन किया गया है, विशेषतः दिङ्नाग, धर्मकीर्ति, शांतरक्षित, कमलशील एवं रत्नकीर्ति द्वारा प्रतिपादित दृष्टिकोणों के संदर्भ में। अ/ययन के प्रथम चरण में दिङ्नाग द्वारा प्रतिपादित अपोह सिद्धांत की मूल अवधारणा का विश्लेषण किया गया है, जहाँ अपोह को शब्दार्थ-निर्धारण की आधारभूत प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है। तत्पश्चात धर्मकीर्ति द्वारा अपोह सिद्धांत के ज्ञानमीमांसात्मक और तर्कशास्त्रीय परिष्कार को स्पष्ट किया गया है, जिसके मा/यम से अपोह को प्रत्यक्ष और अनुमान की संरचना से जोड़ा गया। आगे शांतरक्षित और कमलशील के ग्रंथों में उपलब्ध अपोह संबंधी विवेचन का परीक्षण करते हुए यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार उन्होंने बौद्ध न्याय परंपरा को सुदृढ़ करते हुए अन्य भारतीय दार्शनिक मतों की आपत्तियों का उत्तर प्रस्तुत किया। रत्नकीर्ति के विचारों के विश्लेषण द्वारा अपोहवाद के परवर्ती विकास और उसकी आंतरिक दार्शनिक सूक्ष्मताओं को रेखांकित किया गया है। शोध का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष न्याय एवं मीमांसा दर्शन द्वारा अपोहवाद पर की गई आलोचनाओं का विवेचन है, जिसके आलोक में अपोह सिद्धांत की दार्शनिक सीमाओं और सामर्थ्य का मूल्यांकन किया गया है। अंततः इस अ/ययन में अपोहवाद की भाषा-दर्शन और अर्थमीमांसा के क्षेत्र में उपादेयता को स्पष्ट करते हुए यह प्रतिपादित किया गया है कि यह सिद्धांत बौद्ध न्याय परंपरा के भीतर ही नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन में शब्दार्थ की समस्या को समझने के लिए एक सुसंगत और वैकल्पिक दृष्टि प्रदान करता है।

शब्दकोशः अपोहवाद, बौद्ध न्याय परंपरा, शब्दार्थ सिद्धांत, बौद्ध ज्ञानमीमांसा, भाषा-दर्शन, तात्त्विक निषेध।


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