यह शोध लेख उत्तर भारत के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद के समग्र चिंतन का विश्लेषण प्रस्तुत करता है और यह प्रतिपादित करता है कि उनका दर्शन न केवल आध्यात्मिकता तक सीमित है, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की बहुआयामी प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाता है। विवेकानंद ने भारतीय समाज को आत्मगौरव, शिक्षा, नारी सशक्तिकरण, सामाजिक समरसता, धार्मिक सहिष्णुता, आर्थिक आत्मनिर्भरता और युवा चेतना जैसे क्षेत्रों में नई दिशा प्रदान की। उत्तर भारत, जो प्राचीन वैदिक परंपराओं का केन्द्र, बौद्ध-विरासत का संवाहक, मध्यकालीन संत परंपरा का उद्गम स्थल तथा आधुनिक राष्ट्रवाद का मुख्य आधार रहा है, विवेकानंद के सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने के लिए उपयुक्त क्षेत्र सिद्ध हुआ। यह अध्ययन उन कारणों का विश्लेषण करता है जिनसे उत्तर भारत विवेकानंद के विचारों से प्रभावित हुआ, तथा यह भी स्पष्ट करता है कि आज भी उत्तर भारत की सामाजिक चुनौतियों-जातिगत असमानता, बेरोजगारी, शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट, धार्मिक तनाव, नारी-सुरक्षा, ग्रामीण गरीबी के समाधान में विवेकानंद के सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक हैं। लेख के निष्कर्ष बताते हैं कि स्वामी विवेकानंद का समग्र चिंतन उत्तर भारत के सामाजिक ढांचे को दीर्घकालीन स्थिरता और आधुनिक दिशा प्रदान करने की क्षमता रखता है।
शब्दकोशः स्वामी विवेकानंद, उत्तर भारत, राष्ट्र निर्माण, शिक्षा, नारी उत्थान, युवा जागरण, सामाजिक समरसता, आध्यात्मिकता।