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मीराकांत के रचना संसार में स्त्री

मुकेश कुमार शर्मा (Mukesh Kumar Sharma)

भारतीय समाज सदैव आदर्शवादी रहा है, जहाँ पर भारतीय नारी सम्मानीय ओैर पूजनीय तो है परन्तु इनके लिए स्वातंत्रय शब्द उपयुक्त नहीं लगता, क्योंकि वास्तविकता में भरतीय नारी स्वतंत्र है ही नहीं है। यहाँ उनको अनेक रूढ़िवादी परम्पराओं और कुरूतियों ने जकड़ रखा है। तथा पुरूषवादी समाज होने के कारण उनको ये सब अधिकार कभी प्राप्त ही नहीं हुए। पश्चिमी के देशों में चल नारी मुक्ति आंदोलनों का कुछ असर भारतीय समाज में भी दिखाई दिया परन्तु यह असर अपनी छाप नहीं छोड़ पाया, भारतीय नारी हमेशा से ही जीवन के उतार चढ़ाव और संघर्ष को सहन करती आई है। पाश्चात्य आंदोलनों के कारण भारतीय नारी में सजगता के भाव, आत्मनिर्भर होने का भाव और समान अधिकारों की बात दृष्टिगोचर होता है। भारतीय नारी को वैदिक काल में देवी की प्रतिभा के रूप से पूजा गया था। यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता की भावना को साकार रूप प्रदान किया गया था। जहाँ गार्गी, मैत्रेयी, सूर्या, अपला, देवयानी जैसी आदर्श और महान नारियों को देखा गया जिन्होंने ने केवल आ/यात्मिक व दार्शनिक चिंतन का प्रतिनिधित्व किया प्रारंभ हो गई। अर्थात् जिस भारतीय नारी को वैदिक काल में पूजनीय माना जाता था, पूजा जाता था, उसे धीरे धीरे रूढ़िवादी समाज की व्यवस्थाओं और परम्पराओं ने दासी बना दिया। यही से नारी की स्वतंत्रता का बहिष्कार होने लग गया।  महिलाओं को मात्र साधन मान लिया गया और भोग विलास की वस्तु मान लिया गया। मुगलों द्वारा बहु पत्नी रखने की परम्पराओं के साथ बादशाहों की अनेकों पत्नियाँ रखने की परम्पराएं विद्यमान थी। हिन्दुओं ने अपनी पत्नियों ओर बहन बेटियों को इस कुदृष्टि से बचाने के लिए पर्दा प्रथा का आश्रय लिया। प्रस्तुत शोध आलेख में बताया गया है कि स्वातंत्रयोत्तर युग विभिन्नताओं का युग है। यह युग सिर्फ पुरूष जाति के उत्थान का युग नहीं अपितु नारी उत्थान एवं प्रगति को दर्शाता है। विकास का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जो नारी से अछूता हो।  न सिर्फ भारत में अपितु विश्व में नारी ने अपनी विजय पताका पहरायी है। सन् 1947 के बाद के नाट्य साहित्य पर स्वतंत्रता का विशेष प्रभाव पड़ा है। आधुनिक कवि मेैथिलीशरण गुप्त  ने भी नारी को अबला बना दिया। 
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में है पानी ।।
उन्होनें नारी को अबला बनाकर उसे कमजोर कर दिया। उन्होनें यह विचार नहीं किया कि यह नारी उसे देश की नारी है। जिसमें महारानी लक्ष्मीबाई, रानी सारंधा, रानी दुर्गावती जैसी नारियों ने जन्म लिया है। फिर नारी अबला कैसे हो सकती है। यही प्रसाद युग में आकर पुरूष ने नारी को पहचाना। नारी केवल श्रद्धा है। 
नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में।
पीयूष श्रोत सी बहा करों जीवन के सुन्दर समतल में।।।
लेकिन दीनकर तक आते-आते वही नारी स्वच्छन्द मुक्त होगी। अपसरा बन गयी। जो मातृत्व से ग्रहणा करती है जो एक प्रेम के कारण गर्भ कुरूपता सहन नहीं कर सकती । 

शब्दकोशः साहित्य में स्त्री की स्थिति, संघर्ष, सामाजिक बंधन के प्रति विद्रोह, सामाजिक कार्य यथार्थ का चित्रण, प्रेम वेदना, प्रतिरोध।


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