प्रस्तुत शोध पत्र समकालीन हिंदी साहित्य की एक प्रमुख और प्रतिबद्ध कथाकार मधु कांकरिया के उपन्यासों में निहित नारी विमर्श का गहन विश्लेषण करता है। कांकरिया का साहित्यिक अवदान उन्हें अन्य समकालीन लेखिकाओं से एक विशिष्ट पहचान दिलाता है, क्योंकि उनका लेखन केवल नारी मन की आंतरिक पीड़ा या मध्यवर्गीय परिवार की जटिलताओं तक सीमित नहीं है। इसके बजाय, वह नारी के संघर्ष को व्यापक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संरचनाओं से जोड़ती हैं। उनके उपन्यासों, जैसे ‘सेज पर संस्कृत’, ‘सलाम आख़िरी’, और ‘हम यहाँ थे’, में नारी विमर्श के बहुआयामी स्वरूप का चित्रण मिलता है, जो धार्मिक पाखंड, वेश्यावृत्ति के बाजारीकरण और हाशिए के समुदायों के साथ जुड़े स्त्री के अस्तित्ववादी संकटों को उजागर करता है। यह विश्लेषण दर्शाता है कि कांकरिया के पात्र, व्यक्तिगत दुखों से निकलकर, सामूहिक और व्यवस्थागत शोषण के विरुद्ध मुखर होते हैं। वे नारी को केवल पीड़ित के रूप में नहीं, बल्कि एक सक्रियतावादी (ंबजपअपेज) के रूप में चित्रित करती हैं, जो अन्याय और शोषण के खिलाफ खड़ी होती है। यह शोध पत्र इस बात पर प्रकाश डालता है कि किस प्रकार कांकरिया का नारी विमर्श, पश्चिमी उदारवादी अवधारणाओं से अलग, भारतीय समाज की यथार्थवादी चुनौतियों से प्रेरित है और किस प्रकार उनका लेखन महाश्वेता देवी जैसी सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध लेखिकाओं की परंपरा को आगे बढ़ाता है। कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट यह स्थापित करती है कि मधु कांकरिया का साहित्य हिंदी के नारी विमर्श को एक नया, समावेशी और क्रांतिकारी आयाम प्रदान करता है।
शब्दकोशः साहित्यिक अवदान, नारी विमर्श, धार्मिक पाखंड, बाजारीकरण, व्यवस्थागत शोषण, सक्रियतावादी।