ISO 9001:2015

INTERNATIONAL JOURNAL OF EDUCATION, MODERN MANAGEMENT, APPLIED SCIENCE & SOCIAL SCIENCE (IJEMMASSS) [ Vol. 7 | No. 4 (III) | October - December, 2025 ]

काव्य प्रयोजन: हिन्दी काव्य शास्त्र के संबंध में

डॉ. संगीता कुमारी (Dr. Sangeeta Kumari)

मानव के प्रत्येक कर्म से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई न कोई प्रयोजन अवश्य निहित रहता है। प्रयोजन से तात्पर्य उन उपलब्धियों से है जो किसी कार्य से प्राप्त होती है। काव्य रचना में कवि का जो उद्देश्य होता है। वह ही काव्य-प्रयोजन कहलाता है। कुलपति - ‘‘यश, सम्पत्ति, अलौकिकला आनन्द, दुखोः का नाश, लौकिक चातुर्य और कान्तासम्मित उपदेश, ये छः काव्य के प्रयोजन होते हैं। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी1 ने यश के स्थान पर ‘ज्ञान-विस्तार‘ और ‘मनोरंजन‘ को ही काव्य-प्रयोजन माना है। लोकमंगल ही काव्य का प्रयोजन है। मैथलीशरण गुप्त2 जी ने काव्य के दो प्रयोजन माने हैं - मनोरंजन और उपदेश - ‘‘केवल मनोरंजन न कवि का, कर्म होना चाहिए। उसमें उचित उपदेश का भी, मर्म होना चाहिए।‘‘ जयशंकर प्रसाद3 की मान्यता है - ‘‘संसार को काव्य से दो तरह के लाभ पहुँचते हैं - मनोरंजन और शिक्षा।‘‘ सुमित्रानन्दन पन्त4 ने:स्वांतः सुख‘ और ‘लोक-हित‘ ये दो प्रयोजन स्वीकार किये हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि आधुनिक काल में काव्य-प्रयोजनों पर मौलिकता से विचार हुआ है - आधुनिक आचार्यों तथा कवियों ने युगीन आवश्यकताओं को /यान में रखकर काव्य-प्रयोजनों का विवेचन किया है।

शब्दकोशः प्रयोजन, कल्पनागत अनुभव, जीवन दर्शन, नैतिक दृष्टिकोण, पलायन, विकास व उत्कर्ष।
 


DOI:

Article DOI:

DOI URL:


Download Full Paper:

Download