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सांचौर तहसील में सतत् कृषि विकास की पद्धतियां एवं लाभकारी फसलों का चयनः एक भौगोलिक विश्लेषण

आसुराम एवं डॉ. पूर्णिमा सिंह (Asuram & Dr. Poornima Singh)

राजस्थान के पश्चिमी मरुस्थलीय क्षेत्र में स्थित सांचौर तहसील की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि एवं पशुपालन है, जो प्राकृतिक परिस्थितियों और सीमित संसाधनों पर निर्भर करती है। यहाँ की अर्ध-शुष्क जलवायु, अल्प वर्षा और रेतीली मिट्टी किसानों के लिए स्थायी कृषि को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। परंतु सन् 2008 में नर्मदा नहर परियोजना के विस्तार के कारण तथा स्थानीय कृषक समुदाय ने अपने पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर सतत्  कृषि विकास को नई दिशा प्रदान की हैं। इस शोध कार्य में सांचौर तहसील में अपनाई जा रही सतत् कृषि विकास की पद्धतियों तथा विगत कुछ वर्षों से बोयी जाने वाली व्यापारिक फसलों यथा जीरा, ईसबगोल, रायड़ा, मूंगफली, अरंडी का आर्थिक दृष्टि से उपयुक्तता का स्थानिक विश्लेषण किया गया है। जो कम जल में भी उच्च उत्पादकता देती हैं। जिससे किसानों की आय में वृद्धि हुई है, कृषि जोखिमों में कमी आई है। तथा व्यापारिक एवं बाजारोन्मुख कृषि को स्थायित्व प्राप्त हुआ है। लेकिन इस क्षेत्र में कुछ चुनौतियां भी विद्यमान है जैसे-अर्ध-शुष्क जलवायु, अल्प वर्षा तथा गिरता भूजल स्तर कृषि को अत्यधिक जल-निर्भर बनाता है, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। रेतीली मिट्टी और घटती मृदा उर्वरता के कारण फसल विविधीकरण, आधुनिक तकनीक की कमी भी सतत् एवं लाभकारी कृषि विकास में प्रमुख बाधा बनती है। इन चुनौतियों से निपटने हेतु जल-संरक्षण तकनीकों, फसल विविधीकरण, जैविक खेती, सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई पद्धतियों और सामुदायिक कृषि प्रबंधन को अपनाना आवश्यक है। अतः स्पष्ट है कि सांचौर तहसील की कृषि प्रणाली प्राकृतिक सीमाओं से प्रभावित होने के बावजूद सतत् कृषि विकास की व्यापक संभावनाएँ रखती है। कम जल में अधिक उत्पादन देने वाली फसलों के चयन तथा पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीकों के समन्वय से कृषि को आर्थिक रूप से अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है। जल-संरक्षण, फसल विविधीकरण एवं नवाचार आधारित कृषि पद्धतियाँ क्षेत्रीय कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करती हैं। अतः समन्वित कृषि योजनाएं एवं नीतियों, तकनीक विकास तथा कृषक सहभागिता के मा/यम से सांचौर तहसील में सतत् कृषि विकास को सुदृढ़ किया जा सकता है।

शब्दकोशः सांचौर तहसील, सतत् कृषि विकास, फसल विविधीकरण, जल-संरक्षण, लाभकारी फसलें, स्थानिक विश्लेषण, मरुस्थलीय कृषि, आर्थिक स्थिरता।


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