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INTERNATIONAL JOURNAL OF EDUCATION, MODERN MANAGEMENT, APPLIED SCIENCE & SOCIAL SCIENCE (IJEMMASSS) [ Vol. 7 | No. 4 (III) | October - December, 2025 ]

राजस्थान में उद्योग और औद्योगिक विकास

डॉ. जगदीश प्रसाद मीना (Dr. Jagdish Prasad Meena)

राजस्थान एक पिछड़ा हुआ एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाला प्रदेश है। भौगोलिक स्थिति की प्रतिकूलता, पानी का अभाव, विद्युत की कमी व आधारभूत संरचना के अभाव में यहाँ बड़े पैमाने के उद्योगों का बहुत कम विकास हुआ है। अतः राजस्थान की ग्रामीण जनता के लिए लघु एवं कुटीर उद्योग, ग्रामीण उद्योग, हस्तशिल्प उद्योग एवं खादी उद्योग का विशेष महत्त्व है। ये उद्योग रोजगार, प्रादेशिक आय, औद्योगिक विकेन्द्रीकरण, स्थानीय संसाधनों के उपयोग, कम पूँजी, व तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता की दृष्टि से राजस्थान के लिए विशेष महत्त्व रखते हैं। किसी भी देश के औद्योगिक विकास में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। विकासशील राष्ट्र होने के कारण ये उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था के मेरुदण्ड हैं। इन उद्योगों का हमारी अर्थव्यवस्था में प्राचीनकाल से ही महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। रोजगार की दृष्टि से इन उद्योगों का कृषि के बाद दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारतीय अर्थव्यवस्था में पूँजी का अभाव, श्रम की अत्यधिक पूर्ति तथा तकनीकी ज्ञान का अभाव आदि के कारण इन उद्योगों का महत्त्व बढ़ा है। इन उद्योगों का अतीत बहुत ही गौरवपूर्ण रहा है। किन्तु ब्रिटिश काल में इन उद्योगों का इतना पतन हुआ है कि भारत में ये उद्योग समाप्त प्रायः हो गये। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् इन उद्योगों के विकास पर सरकार ने काफी ध्यान दिया है, फिर भी इन उद्योगों का आशातीत विकास नहीं हो पाया है। लघु एवं कुटीर उद्योगों में अंतर देखने को मिलता है। लघु उद्योग प्रायः आधुनिक क्षेत्र में आते हैं, जबकि कुटीर एवं ग्रामीण उद्योग परम्परागत क्षेत्र में आते हैं। लघु उद्योग बहुधा ग्रामीण क्षेत्रों में पाये जाते हैं और स्थानीय कच्चे माल, स्थानीय दक्षताओं तथा स्थानीय माँग पर आधारित होते हैं, जबकि कुटीर उद्योगों में बहुधा पारिवारिक श्रम का उपयोग किया जाता है। ये उद्योग स्थानीय व विदेशी दोनों प्रकार की माँग की पूर्ति कर सकते है। भारत में ग्रामीणों को रोजगार देने व लोगों की आय में वृद्धि की दृष्टि से कृषि के सहायक उद्योग धन्धों का समुचित विकास करना आवश्यक है। आजकल निर्धनता निवारण की दृष्टि से भी इन उद्योगों का महत्त्व बढ़ गया है। हमारे देश में डैडम् इकाइयाँ परम्परागत लघु क्षेत्र व आधुनिक लघु क्षेत्र दोनों क्षेत्रों में पायी जाती हैं। परम्परागत लघु उद्योग में खादी, हथकरघा, खाद्य तेल, नारियल के रेशे से बने पदार्थ, चमड़ा उद्योग आदि सम्मिलित हैं। आधुनिक लघु उद्योगों में अनेक प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन करने वाली औद्योगिक इकाइयाँ जैसे-पम्प सैट, डीजल इंजन, विद्युत मोटर्स, घड़ियाँ, रेडियो, ट्रांजिस्टर, रेफ्रिजिरेटर, बिजली के पंखे, सिलाई मशीन, टेलिविजन सैट, बिजली के तार, बुनाई की मशीनें, प्लास्टिक व रबड़ की वस्तुएँ, मिक्सर ग्राइन्डर, टेपरिकॉर्डर, टेलिस्कोप, कैमरा, अनेक प्रकार के वैज्ञानिक औजार, घरेलू उपकरण, दवाइयाँ आदि आती हैं, जिनकी खपत देश व विदेश दोनों में होती है। इस प्रकार सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योग का क्षेत्र विस्तृत है। इसी कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में इन उद्योगों को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है, क्योंकि इन्ही उद्योगों पर लाखों ग्रामवासियों तथा वनवासियों का आर्थिक जीवन निर्भर है।

शब्दकोशः उद्योग, औद्योगिकरण, आधारभूत संरचना, परमपरागत अद्योग, औद्योगिक नीति वैष्वीकरण।


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