यह शोध-पत्र भारत के व्यापारिक इतिहास की यात्रा को प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक समेटे हुए है। भारत, जिसे कभी “सोनें की चिड़िया” कहा जाता था, प्राचीन समय से ही मसालों, वस्त्रों, धातुओं और रत्नों के व्यापार के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध रहा है। वैदिक युग से लेकर मध्यकाल तक भारत के व्यापारी स्थल और समुद्री दोनों मार्गों से व्यापार करते रहे, जिससे न केवल आर्थिक समृद्धि बढ़ी बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी हुआ। 16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच यूरोपीय शक्तियों पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी और अंग्रेज़ों के आगमन ने भारत के व्यापारिक ढांचे को गहराई से प्रभावित किया। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौरान भारत को कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता बना दिया गया, जिससे उसकी स्वदेशी उद्योग व्यवस्था को भारी आघात पहुँचा। स्वतंत्रता के पश्चात भारत ने आत्मनिर्भरता की राह पकड़ी और 21वीं सदी में “आत्मनिर्भर भारत” तथा “मेक इन इंडिया” जैसी योजनाओं ने इस दिशा में नई ऊर्जा भर दी। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत सरकार ने लगभग ₹20 लाख करोड़ का प्रोत्साहन पैकेज दिया, जिससे कृषि, उद्योग और डैडम् क्षेत्र को बल मिला। वहीं, “मेक इन इंडिया” पहल से विदेशी निवेश ;थ्क्प्द्ध में अभूतपूर्व वृद्धि हुई और भारत विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरा। यह अध्ययन दर्शाता है कि भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता कोई नई अवधारणा नहीं है, बल्कि उसकी प्राचीन व्यापारिक परंपरा का ही आधुनिक स्वरूप है। यदि देश इसी दिशा में अग्रसर रहा, तो वह पुनः वैश्विक व्यापार का नेतृत्वकर्ता बन सकता है।
शब्दकोशः भारत का व्यापार, प्राचीन भारत, आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, आर्थिक विकास, स्वदेशी उद्योग, औद्योगिक प्रगति, वैश्विक बाजार, उत्पादन, रोजगार, निवेश।