पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के संदर्भ में जनजातीय समुदायों की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये समुदाय प्रकृति के साथ गहरे सामंजस्य में जीवन व्यतीत करते हैं। उनके जीवन का प्रत्येक पक्ष जैसे - आवास, भोजन, आजीविका, औषधि और संस्कृति दृ प्रत्यक्ष रूप से प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होता है। जनजातियाँ पारंपरिक ज्ञान और जीवनशैली के माध्यम से संसाधनों का ऐसा प्रबंधन करती हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता बनी रहती है और जैव विविधता का संरक्षण सुनिश्चित होता है। आधुनिक विकास की दौड़ में जहाँ पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है, वहीं जनजातीय समुदाय सदियों से ऐसे व्यवहारों का पालन करते आ रहे हैं जो प्रकृति के साथ सामंजस्य को बनाए रखते हैं। यह अध्ययन राजस्थान राज्य के परिप्रेक्ष्य में जनजातीय समुदायों की पारंपरिक पर्यावरणीय प्रथाओं, उनकी स्थानीय पारिस्थितिकी के संरक्षण में भूमिका, और सतत विकास के लिए उनके योगदान का विश्लेषण करता है। राजस्थान के प्रमुख जनजातीय समूहों जैसे - भील, मीणा, गरासिया, और सहरिया की आजीविका कृषि, वनोपज, पशुपालन और प्राकृतिक जलस्रोतों पर आधारित होती है। ये समुदाय जल संचयन की पारंपरिक पद्धतियाँ अपनाते हैं, जैसे - जोहड़, बावड़ी और तालाब, जो जल संकट से निपटने में कारगर हैं। इसके अलावा वे वनों से औषधीय पौधों का संरक्षण करते हैं और सीमित तथा आवश्यकता-आधारित संसाधन उपयोग की नीति अपनाते हैं। जनजातियाँ प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं, लेकिन इनसे निपटने के उनके पारंपरिक उपाय आज भी प्रभावी हैं। वे जैव विविधता की रक्षा करते हुए स्थानीय बीजों और फसलों को सहेजते हैं। साथ ही, यह अध्ययन इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि सरकारी योजनाएँ जैसे - वन अधिकार अधिनियम, जनजातीय कल्याण कार्यक्रम, और पर्यावरणीय परियोजनाएं दृ जनजातियों की सक्रिय भागीदारी के बिना सफल नहीं हो सकतीं। उनके पारंपरिक ज्ञान को दस्तावेजीकृत कर नीति-निर्माण में शामिल करना आवश्यक है। अंततः, जनजातियाँ केवल पर्यावरण के उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके रक्षक भी हैं। उनके ज्ञान, व्यवहार और जीवनशैली में पर्यावरणीय संतुलन का दर्शन समाहित है, जिसे अपनाकर सतत और समावेशी विकास की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है।
शब्दकोशः जनजातियाँ, पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, पारिस्थितिकी तंत्र, जलवायु परिवर्तन।