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INSPIRA-JOURNAL OF MODERN MANAGEMENT & ENTREPRENEURSHIP(JMME) [ Vol. 16 | No. 1(II) | January - March, 2026 ]

संस्कृत और पौराणिक साहित्य के आलोक में पर्यावरणीय चिन्तन

डॉ. मिथिलेश कुमार (Dr. Mithilesh Kumar)

संस्कृत एवं पौराणिक साहित्य में पर्यावरणीय चिंतन का विशेष स्थान है। प्राचीन भारतीय मनीषियों ने प्रकृति को दिव्यता के रूप में स्वीकार किया और उसके संरक्षण को धर्म का अंग माना। वेदों, उपनिषदों, पुराणों तथा महाकाव्यों में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश को पंचमहाभूत कहा गया है, जिनसे समस्त सृष्टि का निर्माण होता है। ऋग्वेद में पर्यावरण के संतुलन को मानव जीवन की आधारशिला माना गया है- जैसे ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’के माध्यम से पृथ्वी को माता के रूप में पूजनीय बताया गया। अथर्ववेद में वृक्षों, नदियों, पर्वतों और पशु-पक्षियों के प्रति श्रद्धा और संरक्षण का संदेश दिया गया है। भागवत पुराण और महाभारत में भी वनस्पतियों और जल स्रोतों के दुरुपयोग को अधर्म कहा गया है। प्रकृति और मानव के बीच संतुलन ही सुख-समृद्धि का मूल माना गया है। इस प्रकार, संस्कृत और पौराणिक साहित्य में पर्यावरणीय चिंतन केवल दार्शनिक विषय नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों से जुड़ा हुआ है। यह मानव को पर्यावरण के साथ सह-अस्तित्व और संरक्षण की प्रेरणा देता है, जो आज के वैश्विक पर्यावरण संकट में अत्यंत प्रासंगिक है।

शब्दकोशः वैश्विक साहित्य, पर्यावरण प्रेम, पर्यावरण चेतना, स्रोतसामस्मि जाह्नवी, सामाजिक चिन्तन।
 


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