जोधपुर (मारवाड़) के शासक महाराजा मानसिंह राठौड़ (शासनकालः 1803-1843 ई.) भारतीय इतिहास में केवल एक वीर योद्धा, कुशल रणनीतिकार और कूटनीतिज्ञ के रूप में ही नहीं जाने जाते, अपितु वे उच्च कोटि के विद्वान, संवेदनशील कवि, और कला तथा साहित्य के महान संरक्षक भी थे। राजस्थानी और डिंगल साहित्य के इतिहास में उनका रचनात्मक योगदान अद्वितीय और कालजयी है। प्रस्तुत शोध-पत्र महाराजा मानसिंह द्वारा रचित ’नीति-काव्य’ के साहित्यिक, ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक पहलुओं का सूक्ष्म एवं विस्तृत अन्वेषण करता है। अपने प्रारंभिक जीवन में जालोर दुर्ग के घेरे के दौरान झेले गए भीषण संघर्षों, नाथ संप्रदाय के गुरुओं के प्रति उनके आध्यात्मिक झुकाव, और बाद के वर्षों में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी तथा मराठों के साथ उनके जटिल राजनीतिक समीकरणों ने उनकी जीवन-दृष्टि को गहराई से और स्थायी रूप से प्रभावित किया। इसी यथार्थपरक और कटु अनुभव की प्रत्यक्ष परिणति उनके नीति-काव्य में हुई है। इस शोध-पत्र में यह स्पष्ट किया गया है कि महाराजा मानसिंह का नीति-काव्य किसी वातानुकूलित कक्ष में लिखा गया कोरा आदर्शवाद नहीं है, बल्कि यह एक शासक के भोगे हुए यथार्थ, सत्ता के अंतर्द्वंद्व और तत्कालीन सामंती समाज की राजनीतिक एवं सामाजिक उथल-पुथल का प्रामाणिक दस्तावेज़ है। उनके दोहों और छप्पयों में ’राजधर्म’, ’मित्रता की कसौटी’, ’शत्रु की पहचान’, ’समय की महत्ता’, ’सामाजिक व्यसनों का विरोध’ और ’ईश्वरीय सत्ता के समक्ष मनुष्य की विवशता’ जैसे गूढ़ विषयों का अत्यंत मार्मिक, निर्भीक और स्पष्ट चित्रण मिलता है। प्रस्तुत अध्ययन मुख्यतः ऐतिहासिक, विश्लेषणात्मक और वर्णनात्मक शोध पद्धति पर आधारित है, जिसमें प्राथमिक (पांडुलिपियाँ) और द्वितीयक दोनों प्रकार के ऐतिहासिक स्रोतों का उपयोग किया गया है। निष्कर्षतः, यह शोध यह सिद्ध करता है कि महाराजा मानसिंह केवल एक नाथ-प्रभावित शासक मात्र नहीं थे, बल्कि वे भारतीय परंपरा के एक सच्चे ’राजर्षि’ थे, जिनका नीति-काव्य आज के आधुनिक और लोकतांत्रिक युग में भी शासकों, प्रशासकों और सामान्य जन के लिए एक सुदृढ़ नैतिक मार्गदर्शिका का कार्य कर सकता है।
शब्दकोशः महाराजा मानसिंह, नीति-काव्य, डिंगल साहित्य, राजधर्म, मारवाड़ का इतिहास, नाथ संप्रदाय, मध्यकालीन नैतिकता, सुशासन, संत काव्य परंपरा।