भारतीय साहित्य के इतिहास में राजपूताना की छवि मुख्यतः वीर-काव्य की रही है, परंतु यहाँ की माटी ने उच्च कोटि के भक्ति-काव्य को भी जन्म दिया है। मारवाड़ (जोधपुर) के शासक महाराजा मानसिंह राठौड़ (शासनकालः 1803-1843 ई.) का नाम इस भक्ति परंपरा में अत्यंत विशिष्ट है। वे एक अद्वितीय ’राजर्षि’ थे, जिन्होंने राजसिंहासन पर आसीन होते हुए भी एक योगी और अनन्य भक्त का जीवन व्यतीत किया। प्रस्तुत शोध-पत्र महाराजा मानसिंह द्वारा रचित ’भक्ति-काव्य’ के विविध आयामोंकृविशेषकर नाथ संप्रदाय के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा, कबीर की भांति अद्वैतवाद की स्थापना, और सगुण-निर्गुण भक्ति के समन्वयकृका सूक्ष्म अन्वेषण करता है। अपने प्रारंभिक जीवन में जालोर दुर्ग के घेरे के दौरान जब वे घोर निराशा में थे, तब आयस देवनाथ जी की भविष्यवाणी ने न केवल उनके प्राणों की रक्षा की, बल्कि उन्हें मारवाड़ का शासक भी बनाया। इसी घटना ने उनके हृदय में भक्ति का वह बीज बोया, जो कालांतर में विशाल वटवृक्ष बना। इस शोध-पत्र में यह स्पष्ट किया गया है कि महाराजा मानसिंह का भक्ति-काव्य केवल पारंपरिक स्तुतिगान नहीं है, बल्कि यह हठयोग, नाथ दर्शन और व्यावहारिक आत्मानुभव का काव्यात्मक प्रकटीकरण है। उन्होंने डिंगल, पिंगल और राजस्थानी भाषा में सहस्रों पदों की रचना की और पाखंडों व बाह्य आडंबरों का कड़ा विरोध किया। प्रस्तुत अध्ययन ऐतिहासिक, विश्लेषणात्मक और वर्णनात्मक शोध पद्धति पर आधारित है। निष्कर्षतः, यह शोध यह स्थापित करता है कि महाराजा मानसिंह संत परंपरा को आगे बढ़ाने वाले और तत्कालीन समय में उसे जीवंत रखने वाले एक महान भक्त और दार्शनिक थे।
शब्दकोशः महाराजा मानसिंह, भक्ति-काव्य, नाथ संप्रदाय, एकेश्वरवाद, अद्वैतवाद, निर्गुण उपासना, डिंगल साहित्य।