भारत के आर्थिक शोषण की यह अद्भुत कहानी है अंग्रेजों की सारी व्यापारिक, औद्योगिक, विनिमय दर तथा यातायात जाति यही रही कि भारत की आर्थिक संरचना का उपयोग इंग्लैंड के औद्योगिक एवं व्यापारिक विकास के लिए किया जाये। दादामाई नौरोजी ने भारत की निर्धनता के लिए अन्य विचारकों द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्कों के जिसमें जनसंख्या को दोषी ठहराया तथा अमान्य सिद्ध किया। अपने तर्क से उन्होंने यह तर्क प्रस्तुत किया कि भारत की निर्धनता के लिए भारत की जनसंख्या अथवा दोषपूर्ण आर्थिक नियमों को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए उन्होंने अंग्रेजों की कु्रर आर्थिक शोषण की नीति को उत्तरदायी ठहराया।
1. रानाडे अपने निबंध, इण्डियन, फोरेन इनिग्रेशन 1893 में यह विचार व्यक्त किये पृ. 174 पृ.
2. वर्मा वी.पी. पूर्वाक्त पृ. 191-92 पृ.
3. रानाडे: एसेज इन इण्डियन इकोनोमिक्स 103-4
4. पार्वते, टी.वी. गोपाल कृष्ण गोखले, अहमदाबाद, नवजीवन 1985 पृ. 457
5. स्पीचंेज एण्ड राइटिंग ऑफ तिलक, मद्रास नटेशन 1922 पृ. 256
6. राजपुरोहित, के.एल.: आ/यात्मिक राष्ट्रवाद जोधपुर, साइन्टिपिक पब्लिशर्स 1991 पृ. 255
7. स्पीचेंज एण्ड राइटिंग ऑफ तिलक, मद्रास नटेशन पृ. 25
8. धनंजय कीर, पूर्वोक्त 138 पृ. 220
9. रामगोपाल वर्मा: लोकमान्य तिलक, बम्बई एशिया, 1956
10. केसरी, 20 अप्रैल 1920
11. द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गाँधी, खण्ड 45, न्यू देहली पब्लिकेशन डिविजन 1971 पृ. 167