जल संभरण विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत जल संचयन, जल के सदुपयोग आदि पर विशेष जोर दिया जाता है। जल की कमी वाले क्षेत्रों में इस प्रकार के कार्यक्रम सम्पूर्ण विकास में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। प्रस्तुत शोध पत्र में धौलपुर जिले में विभिन्न योजनाओं के अन्तर्गत संचालित जल संभरण विकास कार्यक्रमों के अन्तर्गत निर्धारित पारिस्थितिक संतुलन, मृदा संरक्षण, वर्षा जल संचय, भूमिगत जल पुनर्भरण, कृषि विकास, पशुपालन, वृक्षारोपण, वानिकी, स्थानीय लोगों की आय में वृद्धि, मृदा अपरदन रोकना, कृषि उत्पादन में वृद्धि, चारागाह विकास आदि उद्देश्यों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। जल संभरण विकास कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में मानचित्र एवं दूर संवेदी तकनीकी के प्रयोग के बढ़ने से इन कार्यक्रमों की सार्थकता और बढ़ गई है। आधुनिक तकनीक के उपयोग से कृषि पद्धति, सामाजिक वानिकी मृदा संरक्षण तथा जल संरक्षण की योजनाएं बनाई जा रही हैं क्योंकि अलग-अलग भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार विधित्तन्त्र अपना कर योजना तैयार की जाती है ताकि अधिकतम उद्देश्यों की पूर्ति की जा सके।
1. जल संभरण विकास कार्यक्रम में कार्यरत यूजर्स समितियों की निर्देशिका (2015 - 16) जल ग्रहण विकास एवं मृदा संरक्षण निदेशालय जयपुर (1-7)
2. एकीकृत ग्रामीण विकास योजनाओं के अधीन जलग्रहण क्षेत्र विकास दिशा-निर्देशन 2007 विशिष्ट योजनाएं एवं एकीकृत ग्रामीण विकास विभाग राजस्थान सरकार जयपुर (पृ. 3-7)
3. Technical Manual for Watershed Development, Watershed Development & Soil Conservation Department, Govt. of Rajasthan] Jaipu
4.Rao, Hanumanth (1994): Guidelines for Watershed Development, Ministry of Rural Development & Govt. of India, New Delhi.
5.Karan, S.K. 1995 : Utilization of Barani Chetna Kendra, State Level Workshop on NWDPRA, Jaipur P8.
6. जाट विरधीचन्द (2000)ः राजस्थान में जलग्रहण प्रबन्धन के पोषणीय विकास के लिए समस्याऐं एवं सम्भावनाऐं
7. जलग्रहण क्षेत्र विकास पुस्तिका, स्वच्छता जल एवं सामुदायिक परियोजना, उदयपुर
Article DOI: 10.62823/JMME/16.01(II).9065