आज के इस भौतिकवादी युग में बढ़ती जनसंख्या एवं बढ़ती जनसंख्या की बढ़ती आवश्यकताओं के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया जाने लगा हैं। संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ने लगा है। जिसके कारण संसाधन संरक्षण एवं उनके अनुकूलतम प्रयोग की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। प्राकृतिक संसाधनों में जल एवं भूमि प्रमुख संसाधन हैं। जल एवं भूमि संरक्षण हेतु सरकारें चिन्तित हैं तथा इस दिशा में सोचने को मजबूर हो रही हैं। राजस्थान सरकार ने 1991 से जल संरक्षण एवं भूमि संरक्षण हेतु जलसंभरण प्रबन्धन एवं भूमि संरक्षण विभाग की स्थापना की जो राजस्थान के प्रत्येक जिले में जलसंभरण विकास कार्यक्रम चला रहा है। जलसंभरण कार्यक्रमों के अन्तर्गत वर्षाजल संचयन, भूमि संरक्षण, मृदा अपरदन को कम करना, पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाये रखना, रोजगार के अवसरों में वृद्धि, चारागाह विकास, वृक्षारोपण, बागवानी को बढ़ावा एवं ग्रामीण परिवारों की आय में वृद्धि हेतु अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं। प्रस्तुत शोध पत्र में जलसंभरण कार्यक्रमों के द्वारा धौलपुर जिले में पारिस्थितिकीय संतुलन स्थापित करने के क्या-क्या प्रयास किये जा रहे हैं तथा इन कार्यक्रमों से जैव पारिस्थतिकी को कितना लाभ पहुँचा है को मापने का प्रयास किया गया है।
1. जलग्रहण विकास दिशा निर्देशिका (मई, 2015) निदेशालय, जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण, राजस्थान सरकार, जयपुर पृष्ठ 28-30
2. वार्षिक प्रतिवेदन (2016) निदेशालय, जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण, राजस्थान सरकार, जयपुर पृष्ठ 6-8
3. प्रशिक्षण पुस्तिका (2017), निदेशालय, जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण, राजस्थान सरकार, जयपुर पृष्ठ 6-16
4. राष्ट्रीय जल नीति, 1987 पृष्ठ 1 - 11
5. जे.एस.समरा, (योजना) जनवरी, 2001 अंक 10 पृष्ठ 25 - 29
Article DOI: 10.62823/IJEMMASSS/8.2(I).9076