भारत में महिला बंदियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, किन्तु उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं तथा विधिक अधिकारों की उपेक्षा आज भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। प्रस्तुत शोध पत्र म/य प्रदेश के धार जिले की महिला बंदियों के संदर्भ में उनके विधिक अधिकारों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15(3), अनुच्छेद 21 तथा अनुच्छेद 39(क), जेल अधिनियम, 1894, आदर्श कारागार नियमावली, 2016, संयुक्त राष्ट्र के बैंकॉक नियम तथा उच्चतम न्यायालय के महत्त्वपूर्ण निर्णयों के आधार पर महिला बंदियों के अधिकारों का अ/ययन किया गया है। शोध में धार जिले की कारागारों में स्वास्थ्य सेवाओं, बच्चों की देखभाल, निःशुल्क विधिक सहायता, लैंगिक सुरक्षा तथा पुनर्वास की वास्तविक स्थिति का विश्लेषण किया गया है। अ/ययन से यह स्पष्ट होता है कि विधिक प्रावधान पर्याप्त होने के बावजूद उनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी सौ प्रतिशत अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाया है। अंत में महिला बंदियों के अधिकारों के प्रभावी संरक्षण तथा उनके सामाजिक पुनर्वास हेतु व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किए गए हैं।
1. भारत का संविधान।
2. जेल अधिनियम, 1894।
3. आदर्श कारागार नियमावली, 2016।
4. राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो, भारत में कारागार सांख्यिकी ।
5. संयुक्त राष्ट्र, महिला बंदियों तथा महिला अपराधियों के लिए गैर-कारावास उपायों संबंधी बैंकॉक नियम, 2010।
6. संयुक्त राष्ट्र, नेल्सन मंडेला नियम।
7. शीला बरसे बनाम महाराष्ट्र राज्य, उच्चतम न्यायालय।
8. आर. डी. उपा/याय बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, उच्चतम न्यायालय।
9. हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य, उच्चतम न्यायालय।
10. राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की वार्षिक प्रतिवेदन।
11. म/य प्रदेश जेल विभाग की वार्षिक प्रतिवेदन।
12. जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, धार की उपलब्ध प्रतिवेदन एवं अभिलेख।
13. महिला बंदियों के अधिकारों से संबंधित विभिन्न शोध-पत्र, शोध-प्रबंध एवं विधिक पत्रिकाएँ।
Article DOI: 10.62823/IJEMMASSS/8.3(I).9229