पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे, जिनके जीवन और चिंतन में आध्यात्मिक चेतना तथा राजनीतिक व्यवहार का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उनका व्यक्तित्व अत्यंत सरल, संयमित और सादगीपूर्ण था, किंतु उनके विचार गहन, व्यावहारिक और राष्ट्रहित से ओतप्रोत थे। वे केवल एक राजनीतिज्ञ ही नहीं थे, बल्कि संगठनकर्ता, कुशल वक्ता, समाज-चिंतक, अर्थ-विचारक, शिक्षाविद्, लेखक और पत्रकार के रूप में भी उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में प्रभावशाली विचारक के रूप मं उपा/याय ने राष्ट्र की अवधारणा की कल्पना की थी। राष्ट्र की उनकी अवधारणा न केवल भौगोलिक सीमाओं से परे जाती है, बल्कि दार्शनिक और वैचारिक ढांचे को भी शामिल करती है। इनका राष्ट्रवाद समाजिक एकजुटता, सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक चेतना के महत्व पर जोर देता है। उपा/याय का राष्ट्रवाद उनके एकात्मक मानवाद की अवधारणा पर केन्द्रित है उनका मानना था कि एक राष्ट्र को व्यक्ति स्वतंत्रता और समुदाय की भलाई के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करना चाहिए। उपा/याय ने व्यक्तियों के बीच समाजिक सदभाव और सहयोग के महत्व जोर देते हुए कहा कि एक राष्ट्र को सामूहि प्रगति और विकास के लिए प्रयास करना चाहिए।
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