यह शोध राजस्थान में पिछले दो दशकों के दौरान दलित सशक्तिकरण को लेकर राजनीतिक भागीदारी और कल्याणकारी नीतियों की भूमिका को समझने की कोशिश करता है। अध्ययन का जोर परिणाम पर है, यानी सिर्फ यह नहीं कि कौन सी योजनाएं बनीं, बल्कि यह कि उनका असल में कितना फर्क पड़ा। पंचायती राज संस्थाओं, विधानसभा और लोकसभा में मिले आरक्षण से दलित समुदाय की राजनीतिक भागीदारी कैसे बदली, और शिक्षा, आवास, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं ने इस समुदाय के उत्थान में क्या योगदान दिया, इन दोनों पहलुओं को साथ रखकर देखा गया है। द्वितीयक स्रोतों पर आधारित इस अध्ययन में सत्ता के पाँच बदलावों की तुलना करते हुए यह सामने आया कि राजनीतिक आरक्षण ने संख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व तो बढ़ाया है, लेकिन असली फैसले लेने की ताकत अभी भी सीमित है। वहीं कल्याणकारी योजनाओं का फायदा भी हर जगह और हर वर्ग तक बराबर नहीं पहुँचा है, महिलाओं और दूर-दराज के इलाकों में यह अंतर ज्यादा साफ दिखता है। अंत में सशक्तिकरण को ज्यादा समावेशी बनाने के लिए कुछ ठोस सुझाव दिए गए हैं।
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