अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के गतिशील क्षेत्र में, भारत-रूस सम्बन्ध एक दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं-एक ऐसी साझेदारी जो शीत युद्ध की जटिलताओं से उबरकर एकधु्रवीय विश्व के दौर से गुजरी और अब एक नव-बहुधु्रवीय वैश्विक व्यवस्था में अपनी प्रासंगिकता सिद्ध कर रही है। यह सम्बन्ध केवल एक राजनयिक गठजोड़ नहीं, बल्कि एक ’’विषेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी के रूप में विकसित हुआ है, जिसकी नींव गहरे विश्वास, रणनीतिक अनुकूलता और ठोस हितों के अभिसरण पर टिकी है। सोवियत काल से ही रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) भारत का एक प्रमुख रक्षा साझेदार रहा है, जिसने भारत की सैन्य क्षमताओं एवं सामरिक स्वायत्तता के निर्माण में अतुलनीय योगदान दिया है। वर्तमान समय में, जब वैश्विक शक्ति सन्तुलन तेजी से बदल रहा है, अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा तीव्र हो रही है और यूक्रेन संकट जैसी घटनाओं ने अन्तर्राष्ट्रीय गठबन्धनों को नई चुनौतियाँ प्रदान की हैं, ऐसे में भारत-रूस सम्बन्धों की मजबूती एवं लचीलापन पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। यह शोध पत्र इसी पृष्ठभूमि में भारत-रूस रणनीतिक सम्बन्धों का, विशेष रूप से उनके सैन्य एवं रक्षा आयामों के केन्द्र में रहकर, गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह दर्शाने का प्रयास करता है कि कैसे यह ’’काल-परीक्षित’’ साझेदारी बदलते वैश्विक परिदृश्य में नई चुनौतियों का सामना करते हुए भी भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा एवं रणनीतिक स्वायत्तता के लिए एक महत्वपूर्ण स्तम्भ बनी हुई है।।