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INTERNATIONAL JOURNAL OF EDUCATION, MODERN MANAGEMENT, APPLIED SCIENCE & SOCIAL SCIENCE (IJEMMASSS) [ Vol. 8 | No. 3 (I) | July-September, 2026 ]

मधु कांकरिया के उपन्यासों में चित्रित परिवारः संयुक्त, एकल एवं विघटित परिवार

सुनिता राव एवं डॉ. राजबाला (Sunita Rav & Dr. Rajbala)

परिवार मानव समाज की सबसे प्राचीन, आधारभूत एवं सार्वभौमिक सामाजिक संस्था है। व्यक्ति का जन्म, पालन-पोषण, समाजीकरण, नैतिक विकास, सांस्कृतिक परंपराओं का हस्तांतरण तथा व्यक्तित्व निर्माण परिवार के माध्यम से ही होता है। भारतीय समाज में परिवार केवल रक्त-संबंधों का समूह नहीं है, बल्कि यह भावनात्मक, सांस्कृतिक, धार्मिक तथा आर्थिक संबंधों का एक सशक्त तंत्र है। बदलते सामाजिक परिवेश, औद्योगीकरण, नगरीकरण, वैश्वीकरण, सूचना-प्रौद्योगिकी, शिक्षा के प्रसार तथा महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता ने भारतीय परिवार की संरचना एवं कार्यप्रणाली में व्यापक परिवर्तन उत्पन्न किए हैं। संयुक्त परिवारों का विघटन, एकल परिवारों का विस्तार तथा पारिवारिक संबंधों में बढ़ती जटिलताएँ आज के समाज की प्रमुख सामाजिक वास्तविकताएँ बन चुकी हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र में मधु कांकरिया के प्रमुख उपन्यासोंकृसेज पर संस्कृत, सलाम आख़िरी, सूखते चिनार, खुले गगन के लाल सितारे तथा हम यहाँ थेकृके आधार पर परिवार की बदलती अवधारणा का समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में गुणात्मक शोध-विधि, विषयवस्तु विश्लेषण तथा समाजशास्त्रीय एवं स्त्रीवादी दृष्टिकोण का उपयोग किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि मधु कांकरिया परिवार को स्थिर संस्था नहीं मानतीं, बल्कि उसे निरंतर परिवर्तनशील सामाजिक व्यवस्था के रूप में देखती हैं। उनके अनुसार परिवार की वास्तविक शक्ति केवल परंपरा में नहीं, बल्कि समानता, संवाद, सहिष्णुता, पारस्परिक सम्मान, भावनात्मक निकटता तथा मानवीय संवेदनाओं में निहित है।

1.    ‘मधु कांकरिया के कथा साहित्य में पारिवारिक युगबोध’, हिंदी जर्नल 
2.    ‘मधु कांकरिया के उपन्यासों में नारी विमर्शः एक विश्लेषणात्मक अध्ययन’, इंस्पिरा जर्नल्स 
3.    ‘हम यहाँ थे उपन्यास में जीवन का यथार्थ एवं आदिवासी संघर्ष’, 
4.    ‘खुले गगन के लाल सितारे उपन्यास में आदिवासी-विमर्श’, कॉलेज शोध प्रपत्र। 
5.    ‘मधु कांकरिया का कथा साहित्यः स्त्री विमर्श’, राजस्थली शोध पत्रिका। 
6.    ‘सलाम आख़िरीः महानगरीय वेश्या जीवन की त्रासद गाथा’, रिसर्चगेट एवं प्श्रम्क्त्। 
7.    ‘सेज पर संस्कृतः धार्मिक पाखंड की गाथा’, रिसर्चगेट 
 


DOI:

Article DOI: 10.62823/IJEMMASSS/8.3(I).9358

DOI URL: https://doi.org/10.62823/IJEMMASSS/8.3(I).9358


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