भारतीय लोकतंत्र में क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों ने महत्वपूर्ण भूमिका हासिल कर ली है। इन्होंने देश के राजनीतिक माहौल को पूरी तरह बदल दिया हैः जहाँ पहले एक ही पार्टी का शासन होता था, वहीं अब कई पार्टियों वाली गठबंधन सरकारें आम बात हो गई हैं। ये पार्टियां क्षेत्रीय और भाषाई पहचान, जातिगत हितों, जातीयता और हर राज्य की खास विकास ज़रूरतों को हाईलाइट करती हैं, साथ ही डेमोक्रेटिक मूल्यों और फेडरलिज्म को भी मजबूत करती हैं। कांग्रेस पार्टी का दबदबा कम होने और पार्लियामेंट में कोएलिशन पॉलिटिक्स के बढ़ने के साथ यह बदलाव और तेज़ हो गया। यह लेख इस बात की पड़ताल करता है कि कैसे क्षेत्रीय पार्टियाँ प्रतिनिधित्व बढ़ाती हैं, संघवाद को मज़बूत करती हैं और राजनीतिक सत्ता के बँटवारे को आकार देती हैं, साथ ही शासन-व्यवस्था के सामने चुनौतियाँ भी खड़ी करती हैं। गठबंधन की रणनीतियों, संघीय व्यवस्थाओं और मौजूदा राजनीतिक हालात के विश्लेषण के ज़रिए, यह अध्ययन दिखाता है कि क्षेत्रीय पार्टियाँ भारत के असमान संघीय ढाँचे में अहम भूमिका निभाती हैंकृइनके पास वीटो पावर होती है और ये संरचनात्मक बफ़र (संरचनात्मक संतुलन बनाए रखने वाले) के तौर पर काम करती हैं। राष्ट्रीय लोकतंत्र में बाधा डालने के बजाय, क्षेत्रीय पार्टियाँ भारत की विविधतापूर्ण, संघीय और प्रतिनिधि राजनीतिक व्यवस्था का एक ज़रूरी हिस्सा हैं। यह 2024 के लोकसभा चुनावों में साफ तौर पर दिखा, जब बीजेपी को सरकार बनाने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन की ज़रूरत पड़ी।
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