वर्तमान युग में मानवता अनेक वैश्विक संकटों से ग्रस्त है महामारी, जलवायु परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य की व्यापक गिरावट, भू-राजनीतिक संघर्ष, आर्थिक असमानता तथा आ/यात्मिक शून्यता। इन संकटों के मूल में मानव चित्त की अस्थिरता, इंद्रिय-सुखों की अति, अहंकार तथा प्रकृति से विच्छिन्नता निहित है। प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा में योग एक समग्र विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित है, जो शरीर, मन, बुद्धि तथा आत्मा के एकीकरण द्वारा व्यक्ति को आंतरिक शांति, समत्व तथा सृष्टि के साथ सामंजस्य प्रदान करता है। यह शोध पतंजलि योगसूत्र, भगवद्गीता तथा उपनिषदों के आलोक में योग की दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक तथा व्यावहारिक प्रासंगिकता का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह सिद्ध करता है कि योग केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का साधन नहीं, अपितु वैश्विक शांति, स्थिरता तथा मानव कल्याण का अनिवार्य आधार है।
1. दिगंबर स्वामी एवं पीतांबर हठप्रदीपिका (स्वात्माराम द्वारा) कैवल्यधाम योग संस्थान लोनावला पुणे, महाराष्ट्र,
2. महेशानंद स्वामी एवं अन्य संपादकीय बोर्ड हठप्रदीपिका ज्योत्सना (ब्रह्मानंद द्वारा) कैवल्यधाम योग संस्थान लोनावाला पुणे, महाराष्ट्र,
3. सरस्वती, स्वामी निरंजनानंद घेरंदा संहिता (महर्षि घेरंदा की योग शिक्षाओं पर टिप्पणी), योग प्रकाशन ट्रस्ट, गंगादर्शन मुंगेर, बिहार, 19971
4. भारती, परमहंस स्वामी अनंत घेरंड संहिता, चौखंबा ओरिएंटलिया, दिल्ली, 20131
5. सरस्वती, स्वामी निरंजनानन्द, योग दर्शन (उपनिषद दृष्टिकोण से योग) योग प्रकाशन न्यास, गंगादर्शन मुंगेर, बिहार, 1994
6. सिन्हा, प्रसाद हरेन्द्रः भारतीय दर्शन की रूपरेखा, मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन, 1963