डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह के साहित्यिक चिंतन में सामाजिक परिवर्तन, मानवीय मूल्यों तथा वैचारिक प्रतिबद्धता का अ/ययन समकालीन भारतीय समाज और हिंदी आलोचना के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है। साहित्य केवल मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ की पहचान, रूढ़ियों की समीक्षा तथा परिवर्तनकारी चेतना के विकास का मा/यम भी है। प्रस्तुत अ/ययन का उद्देश्य उनके साहित्यिक विचारों का विश्लेषण करते हुए सामाजिक विषमता, जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता, आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक वर्चस्व के प्रति उनकी आलोचनात्मक दृष्टि को समझना है। उनके साहित्यिक चिंतन में सामाजिक न्याय, समानता, स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा, संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक चेतना को विशेष महत्त्व प्राप्त है। भारतीय समाज में सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया संवैधानिक समानता, शिक्षा, महिला सशक्तीकरण तथा वंचित समुदायों के अधिकारों से जुड़ी है। डिजिटल मा/यमों, नई शैक्षिक नीतियों और बदलते सामाजिक संबंधों ने भी साहित्य की प्रकृति एवं वैचारिक भूमिका को प्रभावित किया है। अतः साहित्यिक आलोचना का दायित्व केवल रचनाओं की कलात्मक विशेषताओं का मूल्यांकन करना नहीं, बल्कि उनके सामाजिक निहितार्थों और वैचारिक आधारों की समीक्षा करना भी है। प्रस्तुत अ/ययन में विश्लेषणात्मक एवं व्याख्यात्मक पद्धति के मा/यम से डॉ. सिंह की साहित्यिक कृतियों, आलोचनात्मक लेखन तथा संबंधित सामाजिक-वैचारिक संदर्भों का परीक्षण किया जा सकता है। समकालीन भारत में शिक्षा, लैंगिक समानता और सामाजिक समावेशन की स्थिति समझने के लिए सरकारी आँकड़े भी उपयोगी हैं। उदाहरणार्थ, आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण, 2025 में उपलब्ध साक्षरता संबंधी आँकड़े ग्रामीण-शहरी तथा महिला-पुरुष अवसरों के अंतर को समझने में सहायक हो सकते हैं। इस प्रकार, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह के साहित्यिक चिंतन का अ/ययन हिंदी आलोचना में सामाजिक परिवर्तन, मानवीय मूल्यों और वैचारिक चेतना के पारस्परिक संबंधों को स्पष्ट करने में योगदान दे सकता है। साहित्यिक प्रतिबद्धता का मूल्यांकन उसकी सामाजिक प्रासंगिकता, आलोचनात्मक दृष्टि और मानवीय सरोकारों के आधार पर किया जाना चाहिए।
1. भाषा का समाजशास्त्र डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, राजकमल प्रकाशन, प्रा.लि. पटना-800006
2. भारत में नाग परिवार की भाषाएं- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, राजकमल प्रकाशन, प्रा. लि. पटना-800006
3. पंचानवे भाषाओं का समेकित पर्याय शब्दकोश डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, अमन प्रकाशन कानपुर-12(उ.प्र.)
4. भोजपुरी-हिन्दी-इंग्लिश लोक शब्दकोश-केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
5. भाषा साहित्य और इतिहास का पुनर्पाठ-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली-110063
6. भोजपुरी के भाषाशास्त्र-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, अनुवाद जितेन्द्र वर्मा, भोजपुरी साहित्य संस्थान, श्रीभवन, मोहम्मदपुर, लेन, महेन्दू, पटना-6 7.
7. भोजपुरी भाषा व्याकरण आ रचना-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, विशाल पब्लिकेशन, कैलाश मार्केट, दरियापुर, पटना-800004
8. हिंदी साहित्य प्रसंगवश डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, जागृति साहित्य प्रकाशन, पटना-800006
9. दलित साहित्य का इतिहास-भूगोल- डॉ. जयप्रकाश कर्दम-राजेन्द्र प्रसाद सिंह, विशाल पब्लिकेशन, पटना-800004
10. साहित्य में लोकतंत्र की आवाज, सम्पादक राजेन्द्र प्रसाद सिंह, संजय नवले, साहित्य संसद, नई दिल्ली-110045
11. कहानी के सौ सालः चुनी हुई कहानियां- राजेन्द्र प्रसाद सिंह, डॉ. चंद्रमा सिंह, जानकी प्रकाशन, पटना
12. हिंदी साहित्य का सबाल्टर्न इतिहास-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, गौतम बुक सेंटर, शाहदरा, दिल्ली-110093
13. हिंदी की लंबी कविताओं का आलोचना पक्ष राजेन्द्र प्रसाद सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-110002
14. हिंदी की चुनी हुई लंबी कविताओं पर बातचीत डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, अमन प्रकाशन, कानपुर-12 (उ.प्र.)
15. आधुनिक भोजपुरी के दलित कवि और काव्य-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, गौतम बुक सेन्टर, शाहदरा, दिल्ली-110093
16. समाज भाषाशास्त्री, राजेन्द्र प्रसाद सिंह-संपादक-शशिकला जय भारती प्रकाशन 267-बी, मुलीगंज, इलाहाबाद-211003
17. हिंदी का अस्मितामूलक साहित्य और अस्मिताकार- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, अमन प्रकाशन, कानपुर-12 (उ.प्र.)
18. ओबीसी साहित्य विमर्श-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, सम्यक प्रकाशन, पश्चिमपुरी, नई दिल्ली-110063